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Kol rebellion Hero Veer Buddhu Bhagats 192nd martyrdom day.


ऐसे महान कोल विद्रोह के आदिवासी नायक वीर बुद्धू भगत जी के 192वें बलिदान दिवस पर उनके चरणों को स्पर्श 

कोल विद्रोह के नायक वीर बुधु भगत क्रांतिकारी बुधु भगत का जन्म 17 फरवरी, 1792 में रांची (झारखंड) में हुआ था। बचपन से ही तलवारबाजी और धनुर्विद्या का अभ्यास करते थे। साथ में हमेशा कुल्हाड़ी रखते थे। कहा जाता है,उनके पास देवी शक्तियां प्राप्त थी। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई आंदोलन किए। जनजातियों को बचाने के लिए शुरू किए गए लरका आंदोलन और कोल विद्रोह की अगुआई की। अपने दस्ते को गुरिल्ला युद्ध के लिए प्रशिक्षित किया। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ यह कोल विद्रोह आंदोलन सफल विद्रोह आंदोलन था। वीर बुद्धू भगत जी ने अंग्रेज़ अफसरों को सीधे चुनौती पेश की थी। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए उस समय एक हजार रुपये के इनाम की घोषणा की थी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में झारखंड के अनेकों लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया। अनेकों ने आदिवासी समाज और देश की अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राण कुर्बान कर दिये। ऐसे ही एक महानायक थे वीर बुधु भगत। छोटानागपुर के रांची और आसपास के इलाके के लोगों पर बुधु की जबरदस्त पकड़ी थी। उनके एक इशारे पर हजारों लोग अपनी जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार रहते थे। बुधु भगत का सैनिक अड्डा चोगारी पहाड़ की चोटी पर घने जंगलों के बीच था। यहीं पर रणनीतियां बनती थीं। कोल आंदोलन के जननेता बुधु भगत ने अंग्रेजों के चाटुकार जमींदारों, दलालों के विरुद्ध भूमि, वन की सुरक्षा के लिए जंग छेड़ी थी। आंदोलन में भारी संख्या में अंग्रेजी सेना तथा आंदोलनकारी मारे गये थे। अंग्रेजों ने वीर बुद्धू भगत को पकड़ने के लिए,उस समय 1000 हजार रुपया इनाम रखा गया था। बाद में अंग्रेजों ने मौके का फायदा उठाकर वीर बुधु भगत को 13 फरवरी, 1832 को घेरकर गोली से मार दिए। उनकी कहानियां आज भी उन जंगलों में सुनी जाती हैं। क्रूर अंग्रेज अधिकारियों से अंतिम सांस तक लोहा लिया। कोल विद्रोह के दाैरान अंग्रेज सैनिकों ने अंधाधुंध गोलियां चलायीं। बच्चे, बूढ़े और महिलाओं तक को नहीं बख्शा. देखते ही देखते 300 लाशें बिछ गयीं। अंग्रेज सैनिकों के खूनी तांडव के बाद लोगों के भीषण चीत्कार से पूरा इलाका कांप उठा। अन्याय के विरुद्ध जन विद्रोह को हथियार के बल पर खामोश कर दिया गया। बुधु भगत अपने दो बेटों च्हलधरज् और च्गिरधरज् के साथ अंग्रेजों से लोहा लेते हुए शहीद हो गए। कहते हैं कि अंग्रेजों की नाक में दम कर देने वाले इस आदिवासी वीर को उनके साथियों के साथ कैप्टन इंपे ने सिलागांईगांव में घेर लिया। बुधु भगत चारों ओर से अंग्रेज सैनिकों से घिर चुके थे। वह जानते थे कि अंग्रेज फायरिंग करेंगे। इसमें बेगुनाह ग्रामीण भी मर सकते हैं। इसलिए उन्होंने आत्मसमर्पण का प्रस्ताव रखा। लेकिन, क्रूर अंग्रेज अधिकारी ने बुधु भगत और उनके समर्थकों को घेरकर गोलियां चलाने के आदेश दे दिए। अंग्रेजों ने आदिवासी योद्धा के साथ छल कपट किया था। अन्यथा आदिवासियों को रोकना मुश्किल था। अभी बहुत सारे आदिवासी लड़ाकों की कहानियां वीरान पड़ी है। धीरे धीरे सब आदिवासी वीरों कि कहानी सामने आ जायेंगी।

ऐसे महान नायक के चरणों को स्पर्श
वीर बुद्धू भगत अमर रहे अमर रहे 

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